Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
चिति यास्तु चमत्कारं चमत्कुर्वन्ति यस्त्वतः ।
स्वचमत्कृतयोऽन्तस्थास्तदेताः सृष्टिदृष्टयः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
किस रुप से वे जगत् रहते हैं और किस रूपसे नहीं रहते, इस प्रश्न का उत्तर यह है कि चिति
के चमत्कारमात्र रुपये रहते हैं और उस्रके विपरीत रुपये नहीं रहते, यों कहते हैं /
भद्र, चिति के भीतर जो उसके अनेक चमत्कार हैं, वे चमत्कार जो सत्ता स्फूर्ति रूपसे दूसरा
चमत्कार स्वयं करते हैं, यानी सत्ता स्फुरणको जगत् में आरोपित कर प्रकट करते हैं ये ही दूसरे
चमत्कार इन सृष्टि-दृष्टियों के रूपमे (संसारके रूप में) प्रतीत होते हैं