Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
आकाशकोशविशदात्मनि चित्स्वरूपे येयं सदा कचति सर्गपरम्परेति ।
सान्तस्तदेव किल ताप इवान्तरूष्मा भेदोपलम्भ इति नास्ति सदस्त्यनन्तम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए अद्गय परमात्मा में जो विद्वान सर्वत्र सवत्सिकता कहते हैं. वह केवल कल्पनामात्र हैं,
चिदात्मा से अतिरिक्त क भी दूसरी वस्तु नहीं हैं, यह कहते हैं /
आकाशकोश के सदृश अत्यन्त निर्मल चिति के स्वरूप में जो यह अनेकविध सृष्टियों की
परम्परा प्रकाशित हो रही है, वह अन्त मेँ चिदात्मक ब्रह्मरूप ही है, उससे अलग नहीं है ।
जैसे कोई यह शब्द-प्रयोग करे कि “ताप के भीतर उष्णता है” तो उस प्रयोग में “ताप” 'भीतर'
ओर “उष्णता” ये तीनों शब्द एकार्थक ही हैं, उनका पृथक् अर्थ नहीं है, परन्तु प्रयोग
कल्पनामात्र है, वैसे ही जगत् और ब्रह्म दोनों शब्द एकार्थ ही हैं, भिन्नार्थक नहीं है, केवल
कल्पनामात्ररूप से भेद का उपालम्भ होता हे