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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथैवंरूपसंवित्तेः परावृत्त्य प्रयत्नतः । तमम्बरकुटीकोशदेशमागतवानहम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तदनन्तर-धारणा के प्रभाव से उत्पन्न हुए जगत्‌शरीर को देखने के बाद-उक्त कौतुकदर्शनभावनात्मक संवित्ति से (संकल्प से) मैं निवृत्त हो गया, फिर उस पहले के अपने समाधिस्थान आकाशकुटिया के प्रदेश की ओर वापस लौट आया

सर्ग सन्दर्भ

बानबेवाँ सर्ग समाप्त तिरानबेवाँ सर्ग श्री वसिष्ठजी कुटी में ध्यानस्थ सिद्ध का दर्शन, कुटी के उपसंहार से उसका पतन और वसिष्ठजी से निज वृत्तान्त-वर्णन।