Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
सागरे सरलावर्तलेखानुमितसर्पणः ।
दिवि वारिदसंचारमृष्टामृष्टेन्दुदर्पणः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जव मैं समुद्र में रहता था, तब मेरी गति सरल तरंगों की रेखाओं से अनुमित होती थी
और जब मैं आकाश में रहता था, तब मैं कभी चन्द्रमारूपी दर्पणको मेघरूप मल हटाकर स्वच्छ
बना देता था और कभी मेघरूप मलिनता लाकर मलिन बना देता था