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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

सहोदर इव क्षिप्रगामित्वादस्य चेतसः । अनङ्गोऽपि समस्ताङ्गः स्पन्दानन्दनचन्दनः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

मेरी इतनी शीघ्र गति थी कि मैं चित्त का (मनका) सहोदर भाई-सा था, मैं यों तो अनंग था, फिर भी मैं किसी अंग से रहित न था तथा अपने स्पन्दनों से चन्दनों के वनों को आनन्द विभोर बना देता था