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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

व्यवहारमहावाहलेखाजडरवाकुला । रागद्वेषघनोल्लासा भूतलालोलदेहिका ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें व्यवहार महाप्रवाह की रेखा है-इस व्यवहाररूप महाप्रवाह की रेखा से उसमें नानाविध मूर्खप्रलापरूपी जल के शब्द हुआ करते हैं यानी वह जलरवों से व्याकुल रहती है, राग- द्वेषरूप मेघों से वह निरन्तर बढ़ती ही रहती है, भूतलपर उसका शरीर सदा ही चंचल रहता हे