Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
लोभमोहमहावर्ता पातोत्पातविवर्तनी ।
हा तप्ता जीविताख्येयं नदी नदनशीतला ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस जीवन नदी में सदा लोभ-मोह के आवर्त उठते रहते हैं, पतन और उत्पतन से
उसका निरन्तर परिवर्तन होता रहता है, इस प्रकार की यह जीवन नदी शब्दमात्र से तो अत्यन्त
शीतल है, परन्तु अर्थतः वास्तव में तीनों तापों का प्रदान करती हुई बहती जाती है, इसलिए इसकी
भी आशा करना महान् खेद का ही विषय है