Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
चरन्ति चतुराश्चौरा विषमा विषयारयः ।
हरन्ति भावसर्वस्वं जागर्मि स्वपिमीह किम् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
भयंकर शत्रुभूत चतुर विषयरूपी चोर चारों ओर घूमते रहते हैं और विवेकरूपी सर्वस्व का अपहरण
करते हैं, इसलिए अब जागूँ यहाँ सोया क्यो हूँ ?