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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 78

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 78 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 78

संस्कृत श्लोक

संपदः प्रमदाश्चैव तरङ्गोत्सङ्गभङ्गुराः । कस्तास्वहिफणाच्छत्रच्छायासु रमते बुधः ॥ ७८ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पत्तियाँ तथा ललनाएँ तरगों के उत्संग के सदृश अतिक्षणभंगुर हँ, अतः ऐसा कौन ज्ञानी पुरुष होगा, जो साँप के फणरूप छाते की छायाभूत उन सम्पत्ति आदि में रमण करेगा, इससे सम्पत्ति आदि क्षणभंगुर ही नहीं हैं, किन्तु तत्काल मृत्यु-प्रद भी ह, यह जानना चाहिए