Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 85
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 85 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 85
संस्कृत श्लोक
अन्तकः पर्यवस्थाता जीविते महतामपि ।
चलन्त्यायूंषि शाखाग्रलम्बाम्बूनीव देहिनाम् ॥ ८५ ॥
हिन्दी अर्थ
चाहे बड़े-से-बड़े ही क्यों न हों, उनके जीव के ऊपर मृत्युरूप अन्त अवश्य
उपस्थित हो ही जायेगा । देहियों की आयुष्य तो शाखा के अग्रभाग में लटक रहे जलकी ओस
की वृदं के सदुश स्खलित हो जाती हैं