Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 89
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 89 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 89
संस्कृत श्लोक
जीवितं गलति क्षिप्रं जलमञ्जलिना यथा ।
प्रवाह इव वाहिन्या गतं न विनिवर्तते ॥ ८९ ॥
हिन्दी अर्थ
अंजलि से जैसे जल क्षणभर में चला जाता है, वैसे ही यह जीवन क्षणभर में गल जाता है । नदी
के प्रवाह के सदृश बह गयी आयु, फिर लौटकर वापस नहीं आती