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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 92

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 92 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 92

संस्कृत श्लोक

सुखं यदात्मविश्रान्तौ गते मनसि सत्त्वताम् । पाताले भूतले स्वर्गे तन्न भोगेषु केषुचित् ॥ ९२ ॥

हिन्दी अर्थ

मन के वासनानिर्मुक्त हो जाने पर जो आत्मा में विश्रान्ति प्राप्त होती है, उस विश्रान्ति से जो सुख मिलता है, वह न तो पाताल में, न भूतल में, न स्वर्ग में और न किन्हीं भोगों में ही प्राप्त होता हे