Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 93
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 93 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 93
संस्कृत श्लोक
अपि संपूर्णहृद्यार्थाः पञ्चापीन्द्रियवृत्तयः ।
तावज्जयन्ति मामेता भृङ्गं चित्रलता इव ॥ ९३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय में दृढ़ वैराग्य से युक्त मुझ पर सम्पूर्णा विषयों को लेकर भी समस्त इन्द्रियों के
व्यापार विजय नहीं पा सकते, यह कहते हैं ।
जितने प्रिय बुद्धि से गृहीत मनोरम विषय हैं वे सब तथा पाँचों इन्द्रियों की वृत्तियाँ क्या
मुझको जीत सकती हैं ? अर्थात् वे मुझको ऐसे जीत नहीं सकती जैसे कि चित्रलिखित लता
भ्रमर को नहीं जीत सकती