Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
ग्रहीतुं नैव युज्यन्ते ग्रहीतुं शक्नुवन्ति नो ।
आकाशशून्यवपुषः पश्यन्त्याकृतिमात्मनः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
इन पिशाचों को पकड़ना सम्भव
नहीं है और ये भी यदि किसी को पकड़ना चाहें, तो पकड़ नहीं सकते हैं आकाश के समान शून्य
शरीरवाले वे अपनी आकृतिका स्वयं अनुभव करते हैं और परस्पर देखते हैं