Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
शीतातपादिविहितं सुखं दुःखं विदन्ति च ।
पातुमत्तुमवष्टब्धुमीहितुं शक्नुवन्ति नो ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तथा वे सब
शीत ओर तापसे उत्पन्न हुए सुख और दुःख का भी अनुभव करते हैं । किन्तु वे बाहर के जल आदि
पी नहीं सकते, अन्न आदि खा नहीं सकते किसी पदार्थ का अवलम्बन नहीं कर सकते-स्वयं खड़े
नहीं हो सकते तथा लेने देने आदि का यथेष्ट व्यवहार भी वे नहीं कर सकते