Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
ततः शरीरधातूनां तेन पृथ्व्यादिकाः कृताः ।
अभिधाः पञ्च चित्पुष्टा जगदित्येव ताः स्थिताः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
भूतमयता
देखने के वाद ब्रह्माण्डात्मक अपने शरीर के धातुओं के चितिसत्ता से पुष्ट कठिन एवं द्रव्यभूत भागों
की पृथ्वी आदि पाँच संज्ञाएँ उन्होने की है । वे ही पाँचों मिलकर "जगत्" इस नाम से प्रसिद्ध होकर
स्थित हैं