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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

संसारवासनाभावरूपे सक्ता नु यस्य धीः । मन्दो मोक्षे निराकाङ्क्षी स श्वा कीटोऽथवा जनः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

ससार मे अधिक आसक्ति के कारण जो अध्यात्मशा्तर से पराङ्न्लुख रहता है, उसकी निन्दा करते हैं / जिस प्राणी की बुद्धि संसारवासनावश देहेन्द्रिय भोग्यादिरूप अवस्तु स्वभाव में संसक्त रहती है । मोक्षविषय में जिसकी आकांक्षा नहीं होती वह प्राणी कुत्ता है अथवा कीट है, मनुष्य नहीं है (५) क्योकि जैसी अपवित्रता तथा भोगों मे आसक्ति कुत्तों तथा कीट-पतंगों में पायी जाती है वैसी ही अपवित्रता एवं भोगों में आसक्ति उस प्राणी में भी विद्यमान है