Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
भोगाभोगः किलायं यः स जीवन्मुक्तबुद्धिना ।
कीदृशो भुज्यमानः स्यात्कीदृक्स्यान्मौर्ख्यसेविना ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अत्यन्त पवित्र हविः एरोडाशादिरुप ही अन्न देव, द्विज आदि खाते हैं तथा उच्छिष्ट,
फुरीष आदि अपवित्र पदार्थ कुत्ते एवं कीट, पतग आदि सव खाते हैं; वैसे ही जीवन्मुक्त महानुभाव
लोग शुद्ध बिन््मात्र आनन्दस्वरूप शास्त्रादि भोगों का उपभोग करते हैं; किन्तु जो मूर्ख हें वे लोग
अत्यन्त अपवित्र विषयरूप भोग का उपभोग करते हैं. इस आशय से कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, जीवन्मुक्तबुद्धि पुरुष द्वारा उपभुक्त हो रहा भोगों का समूह कैसा होता है
तथा अन्यथा वस्तुवेदनरूप मूर्खता का सेवन करनेवाला जो मूर्ख प्राणी है उसके द्वारा उपभुक्त हो
रहा भोग कैसा होता है, इसका विचार करना चाहिए