Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
नाक्रामन्ति मयाक्रान्ता न च श्रृण्वन्ति मद्वचः ।
इत्यहं मोहमापन्नो विक्रीत इव सज्जनः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
मेँ पादन्यास, आरोहण आदि के द्वारा उनके ऊपर
आक्रमण करता था, परन्तु वे मेरे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकते थे । वे लोग मेरा वचन भी
नहीं सुन सकते थे । इसलिए मैं मोह को प्राप्त हो गया - मुझे पूर्वापरकर्तव्यता का कुछ भी
प्रतिसन्धान न रहा । अतः हे श्रीरामचन्द्रजी, उस समय मैं विक्रीत सज्जन के समान हो गया