Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verses 4–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
अथ चिन्तितवानस्मि सत्यकामा इमे वयम् ।
पश्यन्तु मां सुरगणास्तेन तस्मिन्सुरालये ॥ ४ ॥
द्रष्टुं प्रवृत्ता मामग्रे वास्तव्याः सर्व एव ते ।
झटित्येव पुरं प्राप्तमिन्द्रजालद्रुमं यथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके अनन्तर मैने विचार किया कि हम तो सत्यकाम हैं, इसलिए मैने यह संकल्प किया किये
देवगण मुझे देखें । मेरे संकल्प करते ही देवलोकवासी उन देवताओं में सबके सब ही, जो मेरे
सामने रह रहे थे, नगर में प्राप्त इन्द्रजाल वृक्ष के सदृश मुझे देखने में शीघ्र ही प्रवृत्त हो गये