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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 95, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 95, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

अयं प्रकृत्या विषयैर्वशीकृतः परस्परं स्त्रीधनलोलुपो जनः । यथार्थसंदर्शनतः सुखी भवेन्मुमुक्षुशास्त्रार्थविचारणादितः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

यह प्राणी स्वभाव से ही विषयों के वशीभूत है । एकमात्र यही कारण है कि परस्पर युद्ध, चोरी, हरण आदि से भी स्त्री तथा धन आदि के सम्पादन में यह लोलुप है । यह नानाविध भ्रान्ति के सन्तापो से जल रहा प्राणी मुमुक्षुशास्त्रों के, अर्थो के विचारपूर्वक निदिध्यासन आदि उपायों से यथार्थ वस्तु के अर्थात्‌ आत्मा के संदर्शन से ही सन्तापशून्य पूर्णानन्दरूप होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि संसार से विरक्त होकर प्राणी जब श्रुति आदि के श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि से आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है तब सर्वविध सन्तापो से शून्य सुखी हो जाता है