Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
अतो न किंचिन्म्रियते न च किंचन जायते ।
चित्त्वात्ततश्चित्कचनं जगदित्यनुभूयते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, इन सब कारणों से न कुछ मरता है और न कुछ उत्पन्न होता है । चिति में
प्रकाशन स्वभाव है, इसीसे चित्प्रकाश ही जगत् के रूप में भासता है