Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
एकस्मिन्प्रमृते जन्तावमरिष्यंस्तु सर्वदा ।
सर्व एव जनाः शून्यमभविष्यन्महीतलम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
एक ही भ्रूतात्मा प्रत्येक श्रुत में स्थित ह“ इस श्रुतिप्निद्धान्त के अनुच्मार थ्रूतात्मा का मरण
मानने पर सब श्रुत (प्राणी) मर जायेंगे, यह कहते हैं /
यदि एक प्राणी के मरने पर सदा ही सब जन्तु मर जाते, तो ऐसी स्थिति में सारा भूतल जनों
से रहित-शून्य ही हो जाता, अतः आत्मा मरता नहीं