Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
एकं चिन्मात्रमेवाहं न शरीरादयो मम ।
इति सत्यनुसंधाने क्व जन्ममरणादयः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
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इस स्थिति में वेतनात्या के परिज्ञान से ही जन्म-मरणादविरुप अनर्थ की निवृत्ति छिद ह यह
कहते हैं /
मैं एकमात्र चेतनात्मास्वरूप ही हूँ, मेरा शरीर आदि अनर्थो के साथ संसर्ग है ही नहीं-इस तरह
का जब ठीक ठीक ज्ञान हो जाता है, तब जन्म-मरण आदि अनर्थ रहे ही कहाँ ?