Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अहं चिन्मात्रममलमित्यात्मानुभवं स्वयम् ।
अपहन्त्यात्महन्तारो निमज्जन्त्यापदर्णवे ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, में
निर्मल चेतनमात्ररूप हूँ, इस तरह के आत्मा के अनुभव का जो पुरुष कुतर्कों से खण्डन करते है,
वे पुरुष आपदाओं के समुद्र में डूबते ही रहते हैं