Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
व्योमात्मचेतनमहं के शरीरादयो मम ।
इत्यात्महापह्नुतेऽन्तर्योऽनुभूतं धिगस्तु तम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं आकाश के सदृश निर्मल निर्लेप केवल चेतनस्वरूप हूँ, ये शरीर
आदि अनर्थ मेरे होते कौन हैं ? इस तरह विद्वानों के द्वारा अन्तःकरण में अनुभूत अनुभव को जो
अपने कुतर्कों के बल से खण्डन करता है, वह पुरुष अपनी आत्मा का ही हनन करता है, ऐसे पुरुष
को हजार बार धिक्कार है