Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
कल्लोलैरुह्यमानानां नृणां संसारसागरे ।
अज्ञाता दिवसा यान्ति तृणानामिव बिन्दवः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
सत् शास्र और सद्गुरु दोनों का जल्दी से जल्दी आश्रय लेना चाहिए, क्योकि आयुष्य
विश्वासयोग्य नहीं; इस आशय से कहते हैं /
रामजी, संसारसागर में मनरोधरूपी तरंग परम्पराओं से बहे जा रहे मनुष्यों के दिन ऐसे
अलक्षित रूप से व्यतीत हो जाते हैं, जैसे तिनकों के अग्रभागपर लटके हुए जलबिन्दु