Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
जगत्पूर्वं लतेवापि विश्रान्ता वितते पदे ।
पूर्वापरविचारेण के पराभावदर्शिनः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
रोगो की तृष्णाएँ अति प्रबल हैं; अत: उनसे विरक्त मुमु दुर्लभ हैं; उनमें भी परमात्मा के
स्वरुप को प्रत्यक्ष करनेवाले श्रेष्ठ ज्ञानी, जिनका आपने उल्लेख किया है, आतिदुर्लभ हैं; इस अर्थ
को विस्तार से चुनने के लिए श्रीरामजी पूछते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : गुरुवर, अतिविस्तृत परमब्रह्मरूप पद में पहले से ही प्राणियों की
भोग-तृष्णा जगद्रूप हजारों वृक्षों के वितानो के जाल का विस्तार कर, लता के सदृश, स्थित है।
ऐसी स्थिति में पूर्वापर जगत् स्वरूप अनर्थ के विचार द्वारा परमार्थदर्शी श्रेष्ठ विद्वान कौन होगे
जिनका आपने कथन किया, अर्थात् ऐसे विद्वान ही अत्यन्त दुर्लभ हैं