Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
नष्टात्मस्थितयो भोगवह्निषु प्रज्वलन्त्यलम् ।
देवा दिवि दवेनाद्रौ दह्यमाना द्रुमा इव ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
देव आदि जाति विशेषो में उसीका विस्तार पूर्वक वर्णन करते हैं /
जिन देवताओं की आत्मा में निष्ठा नहीं हुई है, वे देव स्वर्ग मेँ भोगरूपी अग्निकी ज्वालाओं
में ऐसे जलते रहते हैं, जैसे वनाग्नि से पर्वतपर वृक्ष जलते रहते हैं