Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
विद्याधराश्च विद्यानामाधारत्वेन मोहिताः ।
स्फुरितानामुदाराणामपि कुर्वन्ति नादरम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
विद्याधरो में ब्रह्मविद्या की योग्यता है, इसलिए वे विद्या के आधार कहे जाते
हैं, यही कारण है कि वे सबसे अधिक चमकीले हैं, परन्तु उदार विवेकों की ओर वे आदर नहीं
रखते, केवल मोह में फँसकर भोगविद्याओं में ही रात-दिन पड़े रहते हैं । उन्हीं मे मस्त रहते
हैं