Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
यक्षा विक्षोभितभुवो दक्षतामक्षता इव ।
दर्शयन्त्यसहायेषु बालवृद्धातुरेषु च ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यक्षो की भी बात न्यारी है, वे मनुष्यों की निवासभूमिको क्षुब्ध किये हुए हैं, अपने को
अविनाशी-सा समझते हैं यानी अपना शरीर कभी नष्ट नहीं होगा, ऐसा समझते हैं, मणि, मन्त्र
आदि के बलों से विहीन असहाय बाल, वृद्ध ओर आतुरो के ऊपर अपनी दक्षता दशति हैं