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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verses 41–45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verses 41–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 41-45

संस्कृत श्लोक

केवलं यमचन्द्रेन्द्ररुद्रार्कवरुणानिलाः । जीवन्मुक्ता हरिब्रह्मगुरुशुक्रानलादयः ॥ ४१ ॥ प्रजापतीनां सप्तर्षिदक्षाद्याः कश्यपादयः । नारदाद्याः कुमाराद्याः सनकाद्याः सुरात्मजाः ॥ ४२ ॥ दानवानां हिरण्याक्षबलिप्रह्लादशम्बराः । मयवृत्रान्धनमुचिकेशिपुत्रमुरादयः ॥ ४३ ॥ बिभीषणाद्या रक्षस्सु प्रहस्तेन्द्रजिदादयः । शेषतक्षककर्कोटमहापद्मादयोऽहिषु ॥ ४४ ॥ ब्रह्मविष्ण्विन्द्रलोकेषु वास्तव्या मुक्तदेहिनः । मुक्तस्वभावास्तुषिताः सिद्धाः साध्याश्च केचन ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

यों देव आदि योनियें मे विकेक ज्ञान की दुर्लभता बतला कर अब उनमें जो प्रबुद्ध है, उनमें कुछ को परिगणन कर, बतलाते हैं । देवादि में यम, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, सूर्य, वरुण, वायु, हरि, हर, ब्रह्मा, बृहस्पति, शुक्र, अग्नि आदि, प्रजापतियों में सप्तर्षिमण्डल, दक्ष आदि, कश्यप आदि, नारद आदि, सनत्कुमार आदि देवकुमार, दानवों में हिरण्याक्ष, बलि, प्रह्लाद, शम्बर, मय, वृत्र, अन्धक, नमुचि, केशिपुत्र, मुर आदि, राक्षसो मेँ विभीषण, प्रहस्त, इन्द्रजित, आदि, नागों में शेष, तक्षक, कर्कोटक, महापद्म, आदि ये सब तथा ब्रह्मलोक, विष्णु लोक, इन्द्रलोक में निवास करनेवाले मुक्तस्वभाव ओर विदेहमुक्त हैं । इसी तरह कोई तुषित (देवयोनि भेद), सिद्ध एवं साध्य भी जीवन्मुक्त हँ