Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
यथास्थितं सदैवेदं मौनमेव शिलाघनम् ।
अनाद्यन्तमविच्छिद्रमनिद्रं च सनिद्रकम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
शिला के
समान ठोस, शान्त, अपने स्वरूप से अप्रच्युत, उत्पत्ति-नाश से रहित निर्दोष ब्रह्म ही यह सब कुछ
है । वह जैसे निद्रा आत्मा में ही स्वप्नजगत् वैचित्र्य की कल्पना करती है वैसे ही अज्ञानियों की
दृष्टि से अपने में ही जगद्रैचित्र्य की कल्पना कर रहा है, वास्तव में वह निर्विकार है