Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अपरिज्ञप्तिरेवैका तत्र संभ्रमकारिणी ।
परिज्ञातमिदं यावद्विद्यते सापि न क्वचित् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
केवल अज्ञान ही उसमें
भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाला है । जब परम ब्रह्म का परिज्ञान हो जाता है तब अज्ञान का भी कहीं पता
नहीं रहता