Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
परिज्ञाते जगत्स्वप्ने यावत्सत्यं न किंचन ।
ग्रहस्तदेनं प्रति किं स्नेहो वन्ध्यासुते तु कः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जब जगतरूपी स्वप्न का ज्ञान हो जाता है तब उसमें कुछ भी सत्यता नहीं
रहती । जगत् के प्रति अभिनिवेश (आसक्ति) वन्ध्यापुत्र में स्नेह करने के सदृश ही उपहासास्पद
है