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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

स्वप्नकाले परिज्ञाते जगत्स्वप्नमणावणौ । किमुपादेयता कास्था प्रबोधेऽसौ न किंचन ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्नकाल के ज्ञात होने पर प्रत्येक अणु मेँ जगत्‌-स्वप्न की सम्भावना होती है, किन्तु प्रबोधावस्था मेँ जिसका कुछ अस्तित्व नहीं रहता उसकी क्या तो उपादेयता है ओर क्या उसका आदर किया जाय ?