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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

पिपीलिकायाश्चेष्टाभिर्ग्रासावासात्मबन्धुभिः । अस्मद्दिवसकल्पोऽपि न पर्याप्तः क्षणो यथा ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

कण आदि के उपार्जन में पिपीलिका आदि का अधिक प्रयत्न देखा जाता है, इससे भी अनुमान होता है कि उन्हें भोग की आस्था बहुत है, इस आशय से कहते हैं । भद्र, देखिये-ग्रास तथा निवास का सम्पादन तथा कुटुम्बपोषण आदि नानाविध चेष्टाओं से यह प्रतीत होता है कि जैसे पिपीलिका के लिए हमारे दिन जैसा भी दीर्घकाल उनके कणोपार्जन प्रयत्न के लिए क्षण के सदृश पर्याप्त ही नहीं है